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Modern Era Advertising Era,World of Plastic

      Hindi Language

  1.विज्ञापन की दुनिया न्यारी या

 आधुनिक युग विज्ञापन का युग 

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          आज का युग विज्ञापन अथवा प्रचार का युग है। आज वही व्यक्ति अथवा वस्तु सर्वाधिक लोकप्रिय हो जाएगी। जिसका सबसे अधिक प्रचार अथवा विज्ञापन हो बच्चे-बच्चे के मुख से लोकप्रिय विज्ञापनों के शब्द सुने जा सकते हैं।बच्चे क्या बड़े भी उसी उत्पाद को लेना अधिक पसंद करते हैं।जिसका विज्ञापन आकर्षित हो। कोई भाव हो या विचार कोई धार्मिक जलसा जुलूस या प्रवचन हो न हो या फिर किसी राजनीतिक सभा का आयोजन होना हो। कोई नया अविष्कार हुआ हो। 

           उसे दूसरों तक पहुंचाने के लिए अनेक प्रकार के विज्ञापनों का सहारा लिया जाता है। दंत मंजन से लेकर दुल्हन की साड़ी कपड़े धोने के साबुन से लेकर दर्द निवारक दवा तक विज्ञापन के आधार पर बिक रहे हैं ।यही कारण है कि आज विज्ञापन एक व्यापार एक रोजगार का सुलभ साधन बन गया है।हजारों घर परिवार इसी व्यापार के सहारे पल रही हैं तथा ऐश्वर्य पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

काफी लंबा सफर

       भारत में विज्ञापन का आधुनिक युग प्रिंट और रेडियो विज्ञापनों के दिनों से काफी लंबा सफर तय कर चुका है।डिजिटल मार्केटिंग,सोशल मीडिया और मोबाइल टेक्नोलॉजी के आगमन के साथ देश भर के व्यवसायों की मार्केटिंग रणनीतियों में विज्ञापन एक प्रमुख तत्व बन गया है।

          भारत में विज्ञापन के शुरुआती दिन प्रिंट और रेडियो विज्ञापनों पर केंद्रित थे।समाचार पत्र और पत्रिकाएँ विज्ञापन के लिए प्राथमिक चैनल थे जहाँ व्यवसाय अपने लक्षित दर्शकों तक पहुँचने के लिए स्थानीय और राष्ट्रीय प्रकाशनों में विज्ञापन देते थे।रेडियो विज्ञापन भी लोकप्रिय था,व्यवसायों द्वारा कार्यक्रमों को प्रायोजित करने और अपने उत्पादों और सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए जिंगल्स का उपयोग करने के साथ।

तकनीक विकसित हुई

       जैसे-जैसे तकनीक विकसित हुई, टेलीविज़न विज्ञापन बड़े दर्शकों तक पहुँचने का एक लोकप्रिय माध्यम बन गया।1980 के दशक में रंगीन टेलीविजन की शुरुआत ने व्यवसायों के लिए आकर्षक विज्ञापन बनाने के नए अवसर खोले जो दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर सके।कोका-कोला, पेप्सी और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी कंपनियों ने अपने ब्रांड स्थापित करने और यादगार अभियान बनाने के लिए टेलीविजन विज्ञापनों का इस्तेमाल किया जो आज भी याद किए जाते हैं।

       1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने व्यवसायों के लिए अपने संचालन का विस्तार करने और नए ग्राहकों तक पहुंचने के नए अवसर खोले।  इससे विज्ञापन उद्योग का विकास हुआ साथ ही विपणन सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कई नई एजेंसियों ने बाजार में प्रवेश किया।

    वि+ज्ञापन, वि से अभिप्राय विशेष तथा ज्ञापन का अर्थ ज्ञान कराना

             विज्ञापन शब्द दो शब्दों के मेल से बना है वि+ज्ञापन वि से अभिप्राय विशेष तथा ज्ञापन का अर्थ ज्ञान कराने से है। इस प्रकार विज्ञापन का अर्थ विशेष ज्ञान करवाने से है। यह वास्तव में वह कला है जिससे तैयार वस्तुओं की अधिक से अधिक विशेष रूप से जानकारी हो सके तथा इस प्रकार उनकी पूंजी बाजार में मांग बढ़ सके। विज्ञापनों के कारण ही लगातार अपन एवं विकसित हो रही उपभोक्ता संस्कृति को न केवल जन्म बल्कि पूर्ण रूप से विकसित होने में भी उसकी सहायता की।

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     विज्ञापनों के अनेक माध्यम

             आज के युग में विज्ञापनों के अनेक माध्यम उपलब्ध है। प्राचीन काल में डुगडुगी या ढोल बजाकर किसी बात अथवा पदार्थ के उत्पादन की घोषणा की जाती थी। तत्पश्चात पहिए लगे चित्र अथवा लिखित बोर्ड के आगे ढोला डुगडुगी बजाकर विज्ञापन करने का समय आया । उसके पश्चात टांगो इक्को तथा बैल गाड़ियों के पीछे बोर्ड बांधकर विज्ञापन किया जाने लगा।

           फिर जब लाउडस्पीकर का आविष्कार हुआ तो तैयार शब्दों को बोल बोलकर दूर-दूर तक पहुंचाया जाने लगा। फिल्मों का युग आरंभ हो जाने पर फिल्म के शुरू होने से पहले स्लाइड द्वारा विज्ञापनों का चलन शुरू हुआ ।धीरे-धीरे दस्तावेज एक डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनने लगी ।जिनमें विभिन्न उत्पादों की वीडियो दिखाई देने लगी। आजकल टेलीविजन पर भी इसी प्रकार की तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

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    उपभोक्ता को लुभाने के प्रलोभन 

            इसके अतिरिक्त उत्पादक चाय के विज्ञापन के लिए लोगों को चाय मुक्त पिलाकर वनस्पति की मुफ्त बांट कर अथवा हर बड़े पैकेट के साथ एक छोटा पैकेट मुफ्त देकर अपनी चीजों को विज्ञापित करते देखे गए हैं। इस प्रकार की छोटी मोटी अन्य वस्तुओं के प्रचार प्रसार के लिए उपभोक्ता को लुभाने के लिए तरह-तरह के ऐसे प्रलोभन दिए जाते हैं कि विज्ञापन पढ़कर कई बार व्यक्ति आश्चर्यचकित हो जाता है।

    विज्ञापन के अनेक साधन

           आजकल रेडियो पर भी विज्ञापन की भरमार है। समाचार पत्र तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी विज्ञापन की भरमार देखी जा सकती है। कुछ लोगों की मान्यता है कि समाचार अथवा पत्र पत्रिकाएं महज चलती ही विज्ञापन के बल पर हैं ।कई समाचार पत्रों की बिक्री उनके सीने संस्करण के कारण ही अत्याधिक होती है ।यह भी माना जाता है कि जिन पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन प्राप्त नहीं होते ।उनका प्रकाशन शीघ्र ही बंद हो जाता है।

    विज्ञापन करने के तरीके 

            21वीं सदी में व्यवसायों द्वारा अपने उत्पादों और सेवाओं का विज्ञापन करने के तरीके में एक बड़ा बदलाव देखा गया है।  डिजिटल मार्केटिंग सभी आकार के व्यवसायों की मार्केटिंग रणनीतियों में एक प्रमुख तत्व बन गया है।सोशल मीडिया और मोबाइल प्रौद्योगिकी के उदय के साथ व्यवसाय अपने लक्षित दर्शकों तक पहले से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचने में सक्षम हैं।

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

             फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विज्ञापन के लिए लोकप्रिय चैनल बन गए हैं।ये प्लेटफ़ॉर्म व्यवसायों को लक्षित विज्ञापन बनाने की अनुमति देते हैं जो उपयोगकर्ताओं के विशिष्ट समूहों तक उनकी रुचियों, जनसांख्यिकी और ऑनलाइन व्यवहार के आधार पर पहुँच सकते हैं।मोबाइल तकनीक ने डिजिटल विज्ञापन के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसमें व्यवसाय अपने ग्राहकों तक पहुँचने के लिए मोबाइल ऐप और मैसेजिंग सेवाओं का उपयोग करते हैं।

    मापने की क्षमता

           डिजिटल विज्ञापन के प्रमुख लाभों में से एक इसकी अभियानों की प्रभावशीलता को ट्रैक करने और मापने की क्षमता है।Google Analytics जैसे टूल के साथ व्यवसाय ट्रैक कर सकते हैं कि उपयोगकर्ता अपने विज्ञापनों के साथ कैसे इंटरैक्ट करते हैं और अपनी मार्केटिंग रणनीतियों को बेहतर बनाने के लिए डेटा-संचालित निर्णय लेते हैं।इसने डेटा-संचालित मार्केटिंग पर अधिक जोर दिया है जिसमें व्यवसाय अपने अभियानों को अनुकूलित करने और निवेश पर रिटर्न में सुधार करने के लिए एनालिटिक्स का उपयोग करते हैं।

    विज्ञापन एक संगठित व्यवसाय के रूप में

           आरंभ में विज्ञापन संसार कोई संगठित व्यवसाय नहीं था परंतु आज बकायदा एक संगठित व्यवसाय के रूप में विकसित हो चुका है। बाजार के उत्पादों की प्रतिदिन लगातार बढ़ती मांग तथा विज्ञापनों की आवश्यकताओं को देखते हुए इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं बहुत अधिक बढ़ गई हैं ।विभिन्न योग्यताओं वाले लोगों को समेटे हुए रोजगार का यह क्षेत्र इतना विस्तृत विस्तृत है कि कार्यक्षेत्र फैलाने की इसमें अनेक संभावनाएं विद्यमान है।

    आधुनिक युग के विज्ञापन

           आधुनिक युग के विज्ञापन में एक अन्य प्रमुख प्रवृत्ति इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का उपयोग है।  इन्फ्लुएंसर ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनकी सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फॉलोअर्स होते हैं और वे अपने फॉलोअर्स के लिए उत्पादों और सेवाओं का प्रचार कर सकते हैं।व्यवसाय तेजी से अपने लक्षित दर्शकों तक पहुंँचने और ब्रांड जागरूकता बनाने के लिए प्रभावित करने वालों के साथ साझेदारी कर रहे हैं।इससे इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग एजेंसियों का विकास हुआ है जो व्यवसायों को प्रभावित करने वालों और प्रबंध अभियानों से जोड़ने में माहिर हैं।

    डिजिटल विज्ञापन के विकास

           डिजिटल विज्ञापन के विकास के बावजूद विज्ञापन के पारंपरिक रूप जैसे प्रिंट और टेलीविजन विज्ञापन अभी भी भारत में व्यवसायों की विपणन रणनीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  विविध आबादी और उपलब्ध मीडिया चैनलों की एक श्रृंखला के साथ व्यवसायों को अपने लक्षित दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचने के लिए विज्ञापन चैनलों के मिश्रण का उपयोग करना चाहिए।

    विज्ञापन के क्षेत्र में प्रवेश

            विज्ञापन के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए यूं तो अपनी विशिष्ट योग्यता के आधार पर कार्य प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन वर्तमान में इस उद्योग के विस्तार को देखते हुए कई संस्थानों ने विशेष रूप से तैयार पाठ्यक्रमों के आधार पर परीक्षण देना भी शुरू कर दिया है।

     विज्ञापन के जो साधन ऊपर बताए गए हैं। उसके अतिरिक्त भी कई साधन एवं उपाय इस कार्य के लिए अपनाए जाते हैं।

    विज्ञापन भिन्न भिन्न प्रकार 

            इतिषीहार छपवा कर बैठना ,बटवारा पोस्टर छपवा कर जगह-जगह चिपकाना, रंग रोगन द्वारा दीवारों पर लिखवाना, भिन्न भिन्न प्रकार के बड़े-बड़े बोर्ड बनवाकर जगह-जगह लगवाना आदि विभिन्न प्रकार के कूपनयों प्रतियोगिताओं से लाभ की घोषणा करके लोगों को अपनी और आकर्षित करने का भरसक प्रयत्न करना ।सेल काउंटर पर स्त्री पुरुष की बड़ी भीड़ का जवाब इन्हीं के कारण होता है।

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    विज्ञापन का माध्यम

           विज्ञापन का माध्यम चाहे कुछ भी हो परंतु इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न उत्पादों की बिक्री के लिए उपभोक्ताओं को विज्ञापन द्वारा आकर्षित कर अपनी बिक्री बढ़ाना ही होता है। वह वस्तुएं जिनके लोगों ने नाम तक नहीं सुने थे ।वही वस्तुएं आज विज्ञापनों के माध्यम से लोकप्रिय हो रही हैं।

    विज्ञापन के लाभ और हानियां

             जहां एक और विज्ञापन के अनेक लाभ हैं। वहां इससे हानिया भी होती हैं। इन विज्ञापनों पर किया गया खर्च उपभोक्ता को ही उठाना पड़ता है। इससे वस्तु के मूल्य में भी वृद्धि हो जाती है। कई बार विज्ञापन इतनी आकर्षित होते होते हैं कि उनकी चकाचौंध में मनुष्य अपने पैर चादर के बाहर पसारने के लिए भी तैयार हो जाता है। इससे कई बार उसके खून पसीने की कमाई व्यस्त चली जाती है। कई विज्ञापनदाता तथा व्यापारिक संस्थान विज्ञापन करने के लिए अश्लील भद्दे एवं फूहड़ चित्रों का प्रयोग करने में भी संकोच नहीं करते। जिसका समाज पर दुष्प्रभाव पड़ता है तथा समाज का नैतिक पतन होता है।

    विज्ञापन के वास्तविक गुण

           विज्ञापन करना बुरा नहीं लेकिन इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि वस्तु का गुण वास्तविक तथा शालीन ढंग से ही बताया जाना चाहिए। केवल लोगों की भावनाएं भड़का कर घटिया वस्तुओं का बढ़िया शब्दों में गुणगान करके अधिक से अधिक कमाई करना समाज तथा देश के हित में नहीं है। इस मानसिकता को किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

    उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका 

           अंत में भारत में विज्ञापन के आधुनिक युग में डिजिटल मार्केटिंग की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है जिसमें सोशल मीडिया और मोबाइल प्रौद्योगिकी उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।  डेटा-संचालित मार्केटिंग और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग भी उद्योग में प्रमुख रुझान हैं क्योंकि व्यवसाय अपने अभियानों को अनुकूलित करने और नए दर्शकों तक पहुंचने के लिए देखते हैं।

          हालांकि, प्रिंट और टेलीविज़न विज्ञापनों जैसे विज्ञापन के पारंपरिक रूपों का अभी भी व्यवसायों की मार्केटिंग रणनीतियों में एक स्थान है। जो प्रभावी रूप से लक्षित दर्शकों तक पहुँचने में विविध विज्ञापन मिश्रण के महत्व पर प्रकाश डालते हैं।

          2.प्लास्टिक की दुनिया

          आज विज्ञान ने हमारे जीवन में अनेक ऐसी सुविधाएं प्रस्तुत कर दी हैं। जिनकी कल्पना भी पुराने लोगों के लिए कठिन होती।प्लास्टिक की दुनिया हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गई है।घरेलू सामान से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक प्लास्टिक हमारी दिनचर्या में सर्वव्यापी हो गया है।  प्लास्टिक के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है लेकिन सवाल उठता है कि क्या प्लास्टिक पर यह निर्भरता दीर्घकाल में टिकाऊ है।

               विज्ञान ने जहां मानव जीवन को अनेक प्रकार की सुख सुविधाएं प्रदान की है।वही इन सुविधाओं के साथ-साथ अनेक प्रकार की भयंकर समस्याएं भी खड़ी कर दी हैं ।ऐसी ही एक समस्या है प्लास्टिक की समस्या ।यह समस्या आज समस्त विश्व के लिए एक चुनौती बन गई है।

    प्लास्टिक की समस्या

            आज से लगभग 20-25 वर्ष पूर्व प्लास्टिक नाम की कोई समस्या ही नहीं थी। लोग बाजार से आवश्यक सामान लाने के लिए कपड़े के थैले अपने घर से साथ लेकर जाते थे। इसके अतिरिक्त छोटा-मोटा सामान लाने के लिए कागज से बने लिफाफा का प्रयोग किया जाता था परंतु जो जो कागज के दाम बढ़ने लगे त्यों त्यों कागज के लिफाफे भी धीरे-धीरे बनने लगभग बंद हो गए।

            आज कोई भी व्यक्ति सामान लाने के लिए कपड़े का थैला लेकर नहीं जाता क्योंकि आज छोटे बड़े सभी समान के लिए प्लास्टिक निर्णय का प्रयोग ही यंत्र तंत्र सर्वत्र हो रहा है ।आजकल दूध भी यहां तक पानी भी प्लास्टिक के थैलों में बिक रहा है। छोटे-छोटे सम्मान के लिए प्लास्टिक के छोटे-छोटे थैले अथवा प्लास्टिक के लिफाफे प्रयोग किए जा रहे हैं ।सामान्य भाषा में इन्हें पननी कहा जाता है। प्लास्टिक की समस्या वास्तव में इन पनियों की ही देन है।

    केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

           भारत दुनिया में प्लास्टिक के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक रहा है।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन 26,000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है।जो लगभग 10 मिलियन टन वार्षिक है।यह भारत को दुनिया में प्लास्टिक कचरे का 12वां सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनाता है।

    प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग

            प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग ने कई पर्यावरणीय मुद्दों को जन्म दिया है।हर दिन उत्पन्न होने वाला प्लास्टिक कचरा अपघटित होने में वर्षों लग जाता है और हमारे महासागरों और लैंडफिल में समाप्त हो जाता है।जिससे पर्यावरण और वन्य जीवन के लिए खतरा पैदा हो जाता है।प्लास्टिक कचरा हमारी जल निकासी व्यवस्था को भी अवरुद्ध कर देता है जिससे देश के कई हिस्सों में बाढ़ और जलभराव हो जाता है।

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    सभी स्थानों पर प्लास्टिक

          आज सड़कों पर गलियों में बाग बगीचों तथा स्कूल कार्यों के मैदानों में सर्वत्र सभी स्थानों पर प्लास्टिक के यह लिफाफे अथवा पनिया उड़ाते हुए देखे जा सकते हैं। खाने-पीने की प्राय सभी वस्तुएं प्लास्टिक टेक्टों में बंद होकर आती हैं। बड़े-बड़े  सभी लोग इन खाली प्रैक्टो को इधर-उधर फेंक देते हैं। आज देश विदेशों से आने वाले पर्यटकों के कारण पर्वत क्षेत्र भी इन से वंचित नहीं रहे।

    प्लास्टिक का खतरनाक रूप

             इन मुद्दों को हल करने के लिए भारत सरकार ने प्लास्टिक के उपयोग को रोकने के लिए कई पहलें शुरू की हैं।सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है।जिसमें प्लास्टिक बैग,स्ट्रॉ और कटलरी जैसी चीजें शामिल हैं।सरकार ने प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम भी पेश किया है जिसमें प्लास्टिक कचरे के संग्रह और निपटान के लिए एक प्रणाली शामिल है।

               हालाँकि इन पहलों का कार्यान्वयन एक चुनौती रही है।सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध प्रभावी नहीं हो पाया है क्योंकि प्रतिबंध के बावजूद लोग इन वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं।प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं किए गए हैं क्योंकि प्लास्टिक कचरे के संग्रह और निपटान के लिए जागरूकता और बुनियादी ढांचे की कमी है।

    प्लास्टिक के लिफाफे

            प्लास्टिक के यह लिफाफे बहुत ही खतरनाक है।यह अनेक रोगों को जन्म ही नहीं देते बल्कि यह शिविरों को भी बंद कर देते हैं ।कूड़ेदान में पड़े हुए इन लिफाफा को गाय, भैंस आदि पशु खाते हैं क्योंकि इनके साथ कोई न कोई खाद्य पदार्थ लगा रहता है ।यह भोजन के रूप में हजम भी नहीं होते क्योंकि पेट में जाने पर गलते नहीं। 

           यही कारण है इन्हें खाने से पशु बीमार हो जाते हैं। सड़कों पर पड़े इन प्लास्टिक के लिफाफे को जब अन्य पूरे के साथ जलाया जाता है ।तो इसका धुआं सास का रोग उत्पन्न करता है ।इन्हें मलबे के साथ भराव में लाना भी कम खतरनाक नहीं है क्योंकि यह गलता नहीं है।

    प्लास्टिक की हानियां

             प्लास्टिक की हानियों के दृष्टिगत आजकल प्लास्टिक के थैलों का प्रयोग न करने के लिए लोगों को शिक्षित किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए केवल विज्ञापनों का ही नहीं बल्कि नुक्कड़ नाटकों का भी सहारा लिया जा रहा है। स्कूलों में बच्चों को भी यह सलाह दी जाती है कि वे इन प्लास्टिक की पन्नी ओं का प्रयोग न करें।

    प्लास्टिक पर रोक

           सर्वप्रथम इस बात पर भी विचार किया गया था कि इन प्लास्टिक की पन्नीयों को न तो मलबे में भरा जाए न जलाया जाए बल्कि इन्हें प्लास्टिक दानों में बदलकर इसका प्रयोग किया जाए परंतु यह प्रयोग भी सफल सिद्ध नहीं हुआ ऐसा देखने में आया है कि इस प्रकार के प्लास्टिक के थैलों में जब खाने पीने का सामान रखा गया तो वह स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं था क्योंकि इससे अनेक प्रकार की बीमारियों के फैलने का भय बना हुआ था।अतः इस प्रकार के प्लास्टिक के थैलों पर भी बनाने पर रोक लगा दी गई।

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    समाधान कानून से संभव नहीं

           इस समस्या का समाधान कानून से संभव नहीं है। कई राज्यों ने तो इस पर पूर्ण रूप से रोक लगा रखी है परंतु फिर भी आवश्यकता इस बात की है कि जनसाधारण को इसके बारे में सावधान किया जाए ना तो दुकानदार तथा ना ही खरीदे।इस प्रकार के थैलों का प्रयोग करें।

             उदाहरण के लिए भारतीय रेलवे ने प्लास्टिक प्लेटों के बजाय गन्ने के रेशों से बनी बायोडिग्रेडेबल प्लेटों का उपयोग करना शुरू कर दिया है।प्लास्टिक कचरे के मुद्दे को हल करने के लिए कई स्टार्टअप भी अभिनव समाधान लेकर आए हैं जैसे कि ईको-ईंट और निर्माण सामग्री बनाने के लिए प्लास्टिक कचरे का उपयोग करना।

    कचरे का मुद्दा

               प्लास्टिक कचरे का मुद्दा सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा ही नहीं है बल्कि एक आर्थिक मुद्दा भी है।प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण और निपटान रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है और अर्थव्यवस्था में योगदान कर सकता है।प्लास्टिक कचरे को पुनर्नवीनीकरण किया जा सकता है और नए उत्पादों को बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे प्लास्टिक की आवश्यकता कम हो जाती है।

             लोगों को चाहिए कि घर से कपड़े के थैले लेकर चलने की आदत बनाएं तथा दुकानदार से कहें कि वह सम्मान को पन्नों में ना दे।अंत में प्लास्टिक की दुनिया हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई है लेकिन यह पर्यावरण और वन्य जीवन के सामने आने वाले मुद्दों को संबोधित करना महत्वपूर्ण है।

            सरकार, नागरिकों और संगठनों को प्लास्टिक पर हमारी निर्भरता को कम करने और प्लास्टिक कचरे के निपटान के लिए स्थायी समाधान खोजने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।प्लास्टिक कचरे के मुद्दे को संबोधित करने के लिए स्थायी प्रथाओं और सहायक पहलों को अपनाकर हम एक बेहतर और अधिक टिकाऊ भविष्य बना सकते हैं।

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