Munshi Prem Chand,Poet Tulsi Das
मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय-
खान-पान, रहन-सहन और वेशभूषा की भिन्न का आधार प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी रूचि होती है। इसी तरह साहित्य में भी कोई किसी एक लेखक को पसंद करता है और कोई किसी दूसरे को। मेरे बहुत से मित्र गुलशन नंदा, प्रियदर्शी, समीर और कुशवाहा कांत में से किसी एक को- अपनी रूचि के अनुसार अपना प्रिय लेखक मानते हैं, किंतु मैं तो प्रेमचंद जी की रचनाएं ही पसंद करता हूंँ। और वही मेरे प्रिय लेखक हैं
जन्म और रहन-सहन
प्रेमचंद जी का जन्म बनारस के पास लमही नामक गांव में 1880 में हुआ था। इनके पिता डाकखाने में क्लर्क थे और बहुत थोड़ा वेतन पाते थे ।8 वर्ष की अवस्था में प्रेमचंद को माता की मृत्यु का दुख सहना पड़ा था। पिता जी ने दूसरा विवाह कर लिया और बहुत छोटी अवस्था में प्रेमचंद का भी विवाह कर दिया गया।
परिवार के पालन पोषण का बोझ
पिता जी की मृत्यु हो जाने पर परिवार के पालन पोषण का बोझ प्रेमचंद के कंधों पर आ पड़ा। अनेक प्रकार की बाधाओं और कठिनाइयों का सामना करते हुए उन्होंने बी.ए. पास कर ही लिया और शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर बन गए। स्वाधीनता आंदोलन और गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी को त्याग दिया और फिर जीवन पर्यंत लेखनी चलाते रहे।
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प्रेमचंद जी का नाम
प्रेमचंद जी का माता-पिता द्वारा रखा गया नाम धनपत राय था। जब उर्दू में लिखना आरंभ किया तो मुंशी नवाब राय के नाम से लिखने लगे। बाद में वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे और इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। वे स्वयं अपने आप को कलम का मजदूर मानते थे।
प्रेमचंद जी का जीवन
अपने सिद्धांतों के अनुसार उन्होंने अपना दूसरा विवाह एक विधवा शिवरानी देवी से किया। प्रेमचंद का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता था, फिर भी दे निरंतर काम में लगे रहते थे। भारत में स्थापित प्रथम प्रगतिशील लेखक संघ का उद्घाटन उन्होंने ही किया था। आखिर 8 अक्टूबर 1936 को पेट की बीमारी के कारण साहित्य के इस अनमोल रतन का देहावसान हो गया।
प्रेमचंद जी का साहित्यिक जीवन
प्रेमचंद जी ने 300 के लगभग कहानियां लिखी और 12 उपन्यासों की रचना की। कफन, बूढ़ी काकी, शतरंज के खिलाड़ी, दो बैल और पंच परमेश्वर आदि उनकी प्रसिद्ध कहानियां है ।निर्मला, गवन सामाजिक उपन्यास हैं और गोदान, रंगभूमि, कर्मभूमि आदि उपन्यासों में सामाजिक के साथ-साथ राजनीतिक प्रश्न एवं पृष्ठभूमि को भी लिया गया। प्रेमचंद गलप सम्राट और उपन्यास सम्राट की पदवी से सम्मानित हैं।
Hindi Language
प्रेमचंद की कहानियों को घटना प्रधानता की ओर से चरित्र प्रधानता की ओर लाए। उनसे पहले उपन्यास या तो रहस्योरोमांच से संबंधित रखते थे या कोरे उपदेशों से भरपूर होते थे ।उन्होंने उसकी जगह सामाजिक जीवन और युगीन समस्याओं को अपने उपन्यासों का विषय बना कर साहित्य में मानव क्रांति ला दी। आजकल के प्रचलित लेखकों के उपन्यासों के प्रेम का ही चित्रण होता है न तो जीवन की सच्चाईयों को छुआ जाता है और न ही सामाजिक समस्याओं को। प्रेमचंद जी की रचनाएं भारतीय समाज के जीवन का सही और ईमानदारी से चित्रण करती हैं ,इसलिए यह मेरे प्रिय लेखक हैं।
वह साहित्य जो क्षणभर के दिल बहलाने के लिए ही लिखा जाए जनता की रूचि के पीछे लग कर पैसे कमाने के उद्देश्य से लिखा जाए सच्चा साहित्य नहीं होता। ऐसी रचनाओं को लोग पढ़ते हैं और भूल जाते हैं। प्रेमचंद जी ने न तो धन कमाने के लिए पुस्तके लिखी और ना ही हल्की एवं घटिया जनरूचि का अनुसरण किया उनके सामने तो एक महान उद्देश्य था ।
निर्धनता और विपत्तियों का सामना
इसलिए वे निर्धनता और विपत्तियों का सामना करते रहे किंतु अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। उनका साहित्य जीवन का प्रतिबिंब है और जीवन को प्रेरणा देता है। इसलिए उनकी कृतियां अमर भी हैं ।आज संसार की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में उनकी रचनाओं की अनुवाद हो चुके हैं।
प्रेमचंद जी की महत्वता उनकी भाषा शैली में भी है ।उन्होंने आम हिंदुस्तानी की समझ में आने वाली और उसके द्वारा बोली जाने वाली भाषा का प्रयोग किया है। न तो फारसी पर जोर दिया है और न ही संस्कृत के तत्सम शब्दों की भरमार की है।
प्रेमचंद हिंदुओं या मुसलमानों के लेखक नहीं वे तो भारत के महान लेखक हैं। उर्दू, हिंदी भाषाओं के लेखकों को उन पर गर्व है। भारत का और मानव का यह सफल चितेरा ही मुंशी प्रेमचंद है।
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महाकवि तुलसीदास
वैसे तो यह युग कविता का युग नहीं है। हर ओर कहानी और उपन्यास का ही बोलबाला है। फिर भी कुछ लोग हैं जो कविता में रुचि रखते हैं, मैं उन्हीं में से एक हूंँ। मेरा कविता से प्रेम इसलिए है कि कविता थोड़े में ही बहुत कुछ कह जाती है और उसकी एकाध पंकित भी मन और मस्तिष्क को आंदोलित कर जाती है।
धार्मिक संस्कारों वाले परिवार से संबंध
धार्मिक संस्कारों वाले परिवार से संबंध रखने के कारण मुझे तो महाकवि तुलसीदास और उनकी रचनाओं से ही प्रेम है। तुलसीदास पुराने होकर भी पुराने नहीं ,नित्य नूतन हैं, क्योंकि उन्होंने जिन जिन आदर्शों का वर्णन किया है वह शाश्वत सत्य है।
तुलसीदास जी के जीवन के संबंध में कोई पूरा पता नहीं चलता। उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण परिवार में 1589 में इनका जन्म हुआ। कहते हैं बुरे नक्षत्र में जन्म लेने के कारण माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया था और मुनिया नाम दासी ने इनका पालन पोषण किया था। नरहिर दास ने इन्हें शिक्षा दी और धार्मिक ग्रंथ पढ़ाकर विद्वान बना दिया। Hindi Language.
प्रसिद्ध है कि अपनी पत्नी रत्ना के प्रति इनका अत्यधिक प्रेम था। एक बार वह इनकी अनुपस्थिति में मायके चली गई और वह भी उसके पीछे ससुराल जा पहुंचे। पत्नी ने उन्हें डांटा और कहा मेरी हाड-मास की देह से तुम्हें जितना प्रेम है यदि उतना प्रेम श्री रामचंद्र जी से होता तो तुम्हें संसार से भय न होता।
भाव यह है कि तुम भवसागर से पार हो जाते।पत्नी की इस डांट ने तुलसीदास की जीवनधारा को ही नया मोड़ दे दिया। वे घरवार से विरक्त होकर राम भक्ति में लीन हो गए। अनेक जगह घूमे। रामकथा संबंधी अनेक रचनाएं रचीं। संवत् 1680 में इनका देहांत हो गया।
महाकवि तुलसीदास जी द्वारा रचित प्रमाणिक पुस्तके
महाकवि तुलसीदास जी द्वारा रचित प्रमाणिक पुस्तके हैं- रामचरित मानस, कवितावली ,दोहावली ,कृष्णावली, पार्वती मंगल, रामलल हनुमान लाहुक इत्यादि।
उस समय भारतीय धर्म ,सभ्यता और संस्कृति को मिटाने के लिए शासक कोशिश कर रहे थे ।लोग भी निराशा से भरपूर थे ।आस्था को छोड़ बैठे थे। संस्कृत का ज्ञान घट रहा था। प्राचीन ग्रंथ लुप्त हो रहे थे ।ऐसे में इन सब की रक्षा की आवश्यकता थी और तुलसीदास जी ने यही कार्य किया।
रामचरितमानस
रामचरितमानस जिसे प्राय: तुलसी रामायण कहा जाता है सचमुच भारतीय संस्कृति का मानसरोवर है ।उस में डुबकी लगाकर आदर्शों की अनमोल मोती प्राप्त किए जा सकते हैं। एक और आदर्श परिवार का चित्र है ।जहां सभी के हरदयों में स्नेह सद्भावना है। तो दूसरी और राम के आदर्श राज्य का वर्णन है। जहां कोई भी दुखी नहीं है:
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
रामराज कहूं नहीं व्यापा।।
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तुलसीदास राज्य की चर्चा करते हुए कहते हैं कि जिस राज्य की राज्य में प्रजा दुखी रहे। वह राजा नरक का अधिकारी होता है। इससे बढ़कर राजा को उसके कर्तव्य के प्रति कैसे सूचित किया जा सकता है। राम आदर्श पुत्र, आदर्श राजा, आदर्श भाई ,आदर्श मित्र, आदर्श पति और आदर्श स्वामी है। हनुमान आदर्श सेवक ,सुप्रीव आदर्श मित्र, सीता आदर्श पत्नी ,दशरथ आदर्श पिता और निषाद आदि आदर्श भक्त हैं।
तुलसीदास ने वेद- शास्त्रों, दर्शनों एवं अन्य प्राचीन ग्रंथों को मथ कर ज्ञान
तुलसीदास ने वेद- शास्त्रों, दर्शनों एवं अन्य प्राचीन ग्रंथों को मथ कर ज्ञान का जो अमृत प्राप्त किया था ।वह राम चरितमानस में भर दिया है। इसके प्रति हिंदू जाति का आदर भाव देखकर डॉक्टर ग्रियर्सन ने इसे हिंदू जाति की बाइबिल कहा था। ज्ञान के इस अथाह भंडार से हमें हर किसी और हरदशा में कर्तव्य निभाने का संदेश मिलता है। राम चरितमानस जहां धार्मिक दृष्टि से पूजा है वहां कविता की दृष्टि से भी सर्वोत्तम महाकाव्य है।
कवि तुलसीदास राम के दीवाने
कवि तुलसीदास राम के दीवाने थे। उन्हें अलग-अलग रूपों और शैलियों में रामकथा या उसके चुने हुए प्रसंगों को ही अपनी कविता का विषय बनाया है। राम चरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली दोहावली, जानकी मंगल ,बरवै रामायण रामललानहछू सबका संबंध राम कथा से है ।
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तुलसीदास की रचनाएँ
इसका यह अभिप्राय नहीं कि उन्हें अन्य देवी-देवताओं से कोई घृणा है। विनय पत्रिका के आरंभ में गणेश ,पार्वती, शिव ,गंगा ,सरस्वती आदि की सतुतियां है। पार्वती मंगल में शिव -पार्वती के विवाह का प्रसंग है। राम चरित्र मानस में भी शिव की महिमा गाई है। कृष्णा गीतावली में कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन है।
उनकी अनेक रचनाएं संसार के सभी देशों तक पहुंच चुकी हैं। राम चरित्र मानस का अनुवाद संसार की सभी भाषाओं में मिलता है। इस पर अनेक टीकाएँ हो चुकी हैं और अनेक प्रकार के आलोचना ग्रंथ भी लिखे गए हैं। अपनी संस्कृति और अपने साहित्य पर गर्व करने वाले प्रत्येक भारतीय के हृदय में तुलसीदास का स्थान है ।ऐसा लोकप्रिय धर्मप्राण और आदर्श प्रेमी जनकवि तुलसीदास है।
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