भारतीय समाज में बाल मजदूरी(Child Labor In Indian Society)
बाल श्रम भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या है।जिससे हर साल लाखों बच्चे प्रभावित होते हैं।भारत सरकार ने इस मुद्दे को हल करने के लिए विभिन्न कानूनों और नीतियों को लागू किया है लेकिन प्रवर्तन और सामाजिक मानदंडों की कमी के कारण समस्या बनी हुई है जो कुछ समुदायों में बाल श्रम को सहन या प्रोत्साहित करती है।इस लेख में हम भारत में बाल श्रम के कारणों और परिणामों की जांच करेंगे और कुछ ऐसे तरीकों पर चर्चा करेंगे जिनसे समस्या का समाधान किया जा सकता है।
बाल श्रम क्या है
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बाल श्रम क्या है और यह एक समस्या क्यों है। बाल श्रम से तात्पर्य ऐसे किसी भी कार्य से है जो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा किया जाता है जो उनके शारीरिक या मानसिक विकास के लिए हानिकारक है या उनकी शिक्षा में बाधा डालता है। इसमें कारखानों, खानों, कृषि, घरेलू सेवा, या अनौपचारिक श्रम के अन्य रूपों में काम शामिल हो सकता है।बाल श्रम बच्चों को उनके बचपन से वंचित करता है। उन्हें खतरनाक और शोषणकारी कामकाजी परिस्थितियों में उजागर करता है और शिक्षा और सामाजिक विकास के अवसरों को सीमित करता है। यह उनके बुनियादी मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है।
बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ
भारत में बाल श्रम का एक प्रमुख कारण गरीबी है। कई परिवार अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं और जीवित रहने के लिए उन्हें अपने बच्चों के श्रम से होने वाली आय पर निर्भर रहना पड़ता है। बच्चों को अक्सर कम उम्र में काम करने के लिए भेजा जाता है, या तो उनके माता-पिता द्वारा या तस्करों द्वारा जो उनकी भेद्यता का फायदा उठाते हैं। कुछ मामलों में बच्चों को गुलामी में बेच दिया जाता है या खतरनाक उद्योगों जैसे आतिशबाजी कारखानों या ईंट भट्टों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। शिक्षा तक पहुंच का अभाव एक अन्य कारक है जो बाल श्रम में योगदान देता है क्योंकि जो बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं उनके पास काम करने के लिए कुछ विकल्प होते हैं।
अनेक प्रकार की कुरीतियां
भारतीय समाज में अनेक प्रकार की कुरीतियां फैली हुई हैं। यह कुरीतियां इस गौरवशाली समाज के माथे पर कलंक है। समय-समय अनेक समाज सुधारक तथा नेता इन कुरीतियों को समाप्त करने का प्रयास करते रहे हैं परंतु फिर भी इनका समूल नाश संभव नहीं हो सकता है। 'बाल मजदूरी' की कुप्रथा दिन प्रतिदिन और अधिक भयानक रूप धारण करती जा रही है। लगभग पिछले एक दशक से भारतीय समाज के पटल पर एक आंदोलन बड़ी ही तीव्र गति से उभर कर सामने आ रहा है- वह है-'बचपन बचाओ'
लड़के तथा लड़कियों का बचपन
जब भी बचपन बचाने की बात होती है तो निश्चित रूप से यह संकेत उन बच्चों की और है जिनका बचपन छीना जा रहा है। कम उम्र के लड़के तथा लड़कियों को लगभग बंधक बनाकर उनसे कठोर परिश्रम करवाया जाता है। रात दिन के कठिन परिश्रम से इनके हाथ पैर कठोर एवं चलनी भी हो चुके होते हैं। चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कान के स्थान पर अवसाद की गहरी रेखाएं सथाई डेरा डाल चुकी होती हैं। जिनका वर्तमान तथा भविष्य, आशाएं एवं सपने सब कुछ छीन लिया जाता है कहीं उनकी अथवा देश की निर्धनता का बहाना बनाकर उन्हें बाल मजदूरी जैसे श्रम- साध्य कार्य की भट्टी की आग में झोंक दिया जाता है। जिन्हें हाथों में खिलौने तथा पुस्तके होनी चाहिए थी, उनमें हमने औज़ार तथा कुदाले थमा दिए हैं।
एक जानकारी के अनुसार भारत में कामकाजी बच्चों की संख्या 11-12 करोड़ है। इनमें से लगभग 5-6 करोड बच्चे अपने घरों अथवा अपने सगे संबंधियों के घरों के काम में हाथ बंटाते हैं। शेष साढ़े पांच करोड़ बालक अपना पेट पालने के लिए अपना बचपन बेचने को मजबूर हैं।
छोटे-छोटे बालक मजदूरी करते हुए
छोटे-छोटे बालक मजदूरी करते हुए ढाबों, चायघरों, छोटे होटलों आदि में तो अक्सर मिल ही जाते हैं, छोटी बड़ी फैक्ट्रियों के अस्वस्थ वातावरण में भी मजदूरी का बोझ ढोते हुए पराए दिखाई देते हैं। कश्मीर का कालीन उद्योग, दक्षिण भारत का माचिस एवं पटाखे बनाने वाला उद्योग, महाराष्ट्र, गुजरात तथा बंगाल का बीड़ी उद्योग पूर्ण रूप से बाल मजदूरों के श्रम पर ही टिका हुआ है। इन स्थानों पर इन सुकुमार प्यारे- प्यारे बच्चों से बारह-बारह,चौदह-चौदह घंटे काम लिया जाता है पर बदले में बहुत कम वेतन दिया जाता है तथा किसी भी प्रकार की कोई सुविधा इनको नहीं दी जाती। इनके स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखा जाता यदि यह बीमारी के कारण छुट्टी कर लेते हैं तो इनका उस दिन का वेतन काट लिया जाता है। कई मालिक तो छुट्टी करने पर दोगुना वेतन तक काट लेते हैं।
ढाबों,चाय घरों में या फिर हलवाई की दुकानों पर काम कर रहे बालकों की दशा तो और भी दयनीय होती है। कई बार तो उन्हें बचा खुचा लोगों का झूठा भोजन खाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। बात-बात पर गालियां सुननी पड़ती है। मालिकों तथा मैनेजरों के लात घूंसे भी सहन करने पड़ते हैं।
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दयनीय एवं यातनामय
इस प्रकार बाल मजदूरों का जीवन बड़ा ही दयनीय एवं यातनामय हुआ करता है। इसे तो वही जान सकता है जिसने कष्ट एवं दु:खों को स्वयं झेला है। दूसरा व्यक्तित्व केवल उनके दु:ख का अनुमान ही कर सकता है ।कुछ लोग इसे बाल-मजदूरी कहते हैं परंतु वास्तव में यह 'बाल-दासता' है।
बाल-मजदूरी का अस्तित्व
इस बाल-मजदूरी के अपने अस्तित्व में बने रहने तथा बढ़ने के कई कारण हैं जिनमें से प्रमुख कारण है- समाजिक चेतना का अभाव, बाल मजदूरों तथा उनके अभिभावकों में व्याप्त अज्ञानता एवं मजदूरी, बचपन विरोधी विकास नीतियां, कानून का सही ढंग से पालन न किया जाना।
सबसे बडा कारण निर्धनता
सबसे बड़ा कारण जिनके कारण हम इस समस्या से निजात नहीं पा रहे हैं वह देश की निर्धनता। निर्धन लोगों के पास इतने साधन नहीं है कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सके। मजबूर होकर उन्हें बाल मजदूरी के काम में लगाना पड़ता है। अभिभावकों की ना-समझी भी बाल मजदूरी का प्रमुख कारण है। अधिकांश अभिभावक बाल मजदूरी से होने वाली बीमारियों से अवगत नहीं है।
सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड
भारत में बाल श्रम में योगदान देने वाला एक अन्य कारक सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड हैं।कुछ समुदायों में बच्चों के लिए काम करना और परिवार की आय में योगदान करना स्वीकार्य माना जाता है।लड़कियों से अक्सर घर के कामों में मदद करने और छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने की अपेक्षा की जाती है। जो उनकी शिक्षा में हस्तक्षेप कर सकता है और व्यक्तिगत विकास के अवसरों को सीमित कर सकता है।भारत के कुछ हिस्सों में बाल विवाह भी एक आम प्रथा है जिसके कारण लड़कियों को अक्सर स्कूल छोड़ना पड़ता है और उन्हें घरेलू श्रम या कम उम्र में शादी के लिए मजबूर किया जाता है।
बाल मजदूरी की समस्याएं
बाल मजदूरी करने वालों के साथ कई प्रकार की समस्याएं भी जुड़ी रहा करती हैं जैसे पढ़ाई में मन न लगना, फेल हो जाने पर मार के डर से घर से भाग जाना, माता-पिता के सौतेले एवं कठोर व्यवहार से तंग आकर घर त्याग कर देना, बुरी आदतों तथा बुरी संगत में रहकर घरों में न रह पाना, एक नहीं ऐसे अनेक कारण है जिनके कारण बच्चों का सारे का सारा भविष्य दांव पर लग जाता है। कारण कुछ भी हो 'बाल मजदूरी' न केवल किसी एक स्वतंत्र राष्ट्र बल्कि समूची मानवता के माथे पर एक कलंक है।
गंभीर और दूरगामी परिणाम
बाल श्रम के परिणाम गंभीर और दूरगामी होते हैं।लंबे समय तक काम करने वाले बच्चे अक्सर स्कूल नहीं जा पाते हैं जो शिक्षा और भविष्य के रोजगार के अवसरों को सीमित करता है।उन्हें शारीरिक और भावनात्मक शोषण, शोषण और तस्करी का भी खतरा है। बाल श्रम का उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव हो सकता है जिसमें अवरुद्ध विकास, कुपोषण और खतरनाक पदार्थों के संपर्क में आना शामिल है।बाल श्रम भी बच्चों को शिक्षा और कौशल से वंचित करके गरीबी के चक्र को कायम रखता है। जिससे उन्हें इस चक्र से बाहर निकलने की जरूरत होती है।
'बचपन बचाओ आंदोलन'
'बचपन बचाओ आंदोलन' समाज में चेतना जागृत करने का एक महत्वपूर्ण एवं सहारनीय कार्य कर रहा है। इसका प्रारंभ लगभग सन् 1980ई० के आसपास हुआ।'बाल मजदूरी' की समाप्ति के लिए सन् 1986 ईस्वी में अलग से कानून बनाया गया था जिसमें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बारह उद्योगों में बाल मजदूरी की मनाही की गई। इस कानून के अंतर्गत खतरनाक उद्योगों में अपने परिवार के बच्चों से काम लेना वर्जित नहीं है इसकी ओट लेकर कानून को प्रभावी बना दिया है।
दक्षिण-एशियाई बाल दास्तां-विरोधी संगठन का गठन
1989 ईस्वी में बाल मजदूरी के मुद्दे पर दक्षिण एशिया की कई स्वयं सेवी संस्थाओं ने मिलकर दक्षिण-एशियाई बाल दास्तां-विरोधी संगठन का गठन किया। भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश तथा श्रीलंका आदि देश इसके साथ जुड़े हुए हैं। इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए हम अपना सक्रिय योगदान कर सकते हैं। हम कब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे या मासूम बच्चों का भविष्य दांव पर लगता देखते रहेंगे?
निषेध और विनियमन
बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम 1986 सहित बाल श्रम के मुद्दे को हल करने के लिए भारत सरकार ने कई कानूनों और नीतियों को लागू किया है जो खतरनाक व्यवसायों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है और गैर-कार्यक्षेत्रों में बच्चों के लिए काम की शर्तों को नियंत्रित करता है। खतरनाक व्यवसाय। सरकार ने शिक्षा को बढ़ावा देने और ज़रूरतमंद परिवारों को सहायता प्रदान करने के लिए कई पहलें भी शुरू की हैं। जैसे कि सर्व शिक्षा अभियान जिसका उद्देश्य सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना है, और मिड-डे मील योजना, जो स्कूली बच्चों को मुफ्त भोजन प्रदान करती है।
एक व्यापक समस्या
इन प्रयासों के बावजूद बाल श्रम भारत में एक व्यापक समस्या बनी हुई है। मुख्य चुनौतियों में से एक प्रवर्तन है क्योंकि कई नियोक्ता और तस्कर कानून से बचने और बच्चों का शोषण करने में सक्षम हैं। बाल श्रम के हानिकारक प्रभावों और बच्चों के विकास के लिए शिक्षा के महत्व के बारे में अधिक जागरूकता और शिक्षा की भी आवश्यकता है। माता-पिता, शिक्षकों और स्थानीय नेताओं को शामिल करने वाले समुदाय-आधारित दृष्टिकोण बाल श्रम की समस्या को दूर करने और शिक्षा को बढ़ावा देने में प्रभावी हो सकते हैं।
शिक्षा और भविष्य के अवसर
जबकि भारत सरकार ने इस मुद्दे को हल करने के लिए कदम उठाए हैं बाल श्रम का मुकाबला करने और सभी बच्चों के लिए शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अधिक प्रवर्तन और समुदाय आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।बाल श्रम के मुद्दे को संबोधित करने के लिए एक आशाजनक दृष्टिकोण सामाजिक उद्यमिता को बढ़ावा देना है।सामाजिक उद्यमी ऐसे व्यक्ति होते हैं जो बाल श्रम सहित सामाजिक समस्याओं को दूर करने के लिए नवीन व्यवसाय मॉडल का उपयोग करते हैं। कमजोर बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान करने वाले व्यवसायों का निर्माण करके, सामाजिक उद्यमी गरीबी के चक्र को तोड़ने में मदद कर सकते हैं और इन बच्चों के उज्जवल भविष्य का मार्ग प्रदान कर सकते हैं।
मोबाइल फोन और इंटरनेट की व्यापक उपलब्धता
प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से एक और आशाजनक दृष्टिकोण है। भारत में मोबाइल फोन और इंटरनेट की व्यापक उपलब्धता के साथ, कमजोर बच्चों को शिक्षा और सहायता प्रदान करने के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने का अवसर है। उदाहरण के लिए, संस्था प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन ने रीड इंडिया नामक एक मोबाइल ऐप विकसित किया है जो ग्रामीण क्षेत्रों में उन बच्चों को साक्षरता सहायता प्रदान करता है जिनकी औपचारिक शिक्षा तक पहुंच नहीं है।
अंत में बाल श्रम भारतीय समाज में एक जटिल और व्यापक समस्या है जो गरीबी, सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंडों और शिक्षा तक पहुंच की कमी से प्रेरित है। बाल श्रम के परिणाम गंभीर और लंबे समय तक चलने वाले होते हैं जो बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
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हमें चाहिए कि हम उन चीजों का उपयोग न करें जो बच्चों द्वारा बनाई जा बेची जाती हैं। ऐसा करने से हम उनको इस काम के लिए हतोत्साहित कर सकते हैं। जहां तक संभव हो सके अपने आसपास के बच्चों को स्कूल भिजवाने के लिए प्रेरित करें।
उन चाय के ढाबों, साइकल आदि की मरम्मत की दुकानों का उपयोग न करें, जिनमें छोटे बच्चों को काम पर लगाया गया हो।
बाल मजदूरी के खिलाफ जनमत बनाने के उपाय करें दीवारों पर नारे लिखवाए, रैली निकाली तथा नुक्कड़ सभाएं करें।
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बच्चों को उकसाना
बच्चों को मजदूरी के लिए उकसाने वाले, उन पर अत्याचार करने वाले मालिकों की सूचना पुलिस तथा स्वयंसेवी संगठनों को दें।
देश का भविष्य
देश का भविष्य कहे-जाने वाले बच्चों को किसी भी कारण से मजदूरी करनी पड़े, इसे किसी भी प्रकार से उचित अथवा मानवीय नहीं कहा जा सकता। घरों में बालकों के रह सकने योग्य सुविधाएं परिस्थितियां पैदा करना आवशयक है,कानून की पालना कठोरता से हो, तभी इस समस्या का समाधान संभव हो सकता है तथा बच्चों के भविष्य को उज्जवल बनाया जा सकता है।इसलिए पूरे विश्व में बाल श्रम 12 जून को मनाया जाता है। ताकि लोगों में चेतना जागृत हो।
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