वर्तमान शिक्षा प्रणाली और नकल की समस्या
Current education system and the problem of cheating
भूमिका-
भारत देश में शिक्षा का महत्व
भारत देश में शिक्षा का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। यह कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भारत में ही सबसे पहले सभ्यता संस्कृति ज्ञान विज्ञान का उदय हुआ। हमारे देश में तक्षशिला, नालंदा वाराणसी तथा मिथिला जैसे विश्वविद्यालय स्थापित थे। यहां देश-विदेश के असंख्य छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आया करते थे। तक्षशिला विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय है। जिसकी स्थापना 700 ई०पू० हुई थी ।यहां देश-विदेश के लगभग 10500 छात्र 60 विषयों में शिक्षा ग्रहण किया करते थे। प्राचीन समय में गुरु और शिष्य का संबंध बहुत ही सौहार्दपूर्ण होता था।गुरु अपने शिष्यों को अपने पुत्रों के समान स्नेह एवं प्यार करते थे। इस शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक विकास करना होता था लेकिन शताब्दियों की प्राधीनता ने हमारी इस आदर्श शिक्षा प्रणाली को नष्ट भ्रष्ट कर दिया।
देश के भावी कर्णधार युवा शक्ति
प्रत्येक देश के भावी कर्णधार उस देश की युवा शक्ति ही हुआ करती है। उस देश के नव युवकों की जैसी शिक्षा-दीक्षा होगी ।देश का भविष्य भी वैसा ही होगा दूसरी और यदि किसी देश को युगों -युगों तक गुलाम बनाना है, उसे पराधीनता की जंजीरों में जकड़ना है तो उस देश का साहित्य तथा इतिहास नष्ट कर उस देश की शिक्षा प्रणाली बदलकर अपने अनुकूल कर लीजिए ।अंग्रेजों ने भी इसी नीति पर चलते हुए अपने शासन को भारत में सुदृढ तथा चिरस्थाई बनाने के लिए हमारे प्राचीन साहित्य एवं इतिहास को नष्ट भ्रष्ट करके अपने ही ढंग से शिक्षा व्यवस्था को लागू किया। जिसमें अंग्रेजी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया गया ।आज बी.बी.ए तक अंग्रेजी एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। जबकि हमें आजादी मिले हुए लगभग 70 साल से ज्यादा हो गए हैं।
शिक्षा में सकारात्त्मक विषय -वस्तु
शिक्षा में सकारात्त्मक विषय -वस्तु के अभाव में हमारे विद्यार्थी अश्लील एवं असभ्य साहित्य पढ़ना ही अधिक पसंद करते हैं। उनकी अध्ययन प्रणाली उनमें सीखने की इच्छा व ग्रहण प्रयास के अभाव को व्यक्त करती है। स्तरीय लेखकों की पाठ्य- पुस्तकों एवं संदर्भ से साहित्य को भी मानों विदाई दे दी गई है। सरल गाइडों एवं कुंजियों का ही बोलबाला बाजार में हो गया है।
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निजी अध्ययन (ट्यूशन)
निजी अध्ययन (ट्यूशन) भी विद्यार्थियों के लिए सफलता का दूसरा सरल उपाय बन गया लगता है ।कुछ अध्यापक विद्यार्थियों को कक्षा में पूरी मेहनत और लगन से न पढ़ा कर बच्चों को ट्यूशन के लिए दबाव डालते हैं। इससे छात्रों का पढ़ाई में उत्साह भी कम हो जाता है और वह भी सरल मार्ग द्वारा धन धनोपार्जन के अनुचित मार्ग खोजते हैं जिससे समाज में अनैतिकता को बढ़ावा मिलता है।
ज्ञान विज्ञान एवं इतिहास गौरवशाली एवं समृद्ध
हमारा ज्ञान- विज्ञान एवं इतिहास इतना गौरवशाली एवं समृद्ध है परंतु फिर भी भारत के छात्रों को इसकी जानकारी से वंचित क्यों रखा जाता है ,यह हमारी समझ से बाहर है। विश्व का सबसे पहला औषधि विज्ञान भारतीयों ने 'आयुर्वेद' के रूप में दिया ।चरक ने 25सौ वर्ष पूर्व औषधि विज्ञान को आयुर्वेद के रूप में संकलित किया। लिम्का बुक आफ रिकॉर्ड्स के अनुसार 400 ई० पू० सुश्रुत नामक भारतीय चिकित्सक ने सर्वप्रथम प्लास्टिक सर्जरी का प्रयोग किया था।
हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में दोष
हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में और भी बहुत से दोष हैं जिनका यदि विस्तार से वर्णन किया जाए तो एक पूरी पुस्तक तैयार हो सकती है। इसीलिए संक्षिप्त रूप से हम कह सकते हैं कि हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिक शिक्षा का बिल्कुल अभाव है। किसी स्कूल कालेज या विश्वविद्यालय में नैतिक शिक्षा के लिए किसी शिक्षा बोर्ड, एन.सी.ई.आर.टी अथवा किसी विश्वविद्यालय द्वारा कोई पाठ्यक्रम निर्धारित नहीं है न ही इस विषय की कोई परीक्षा ली जाती है।
हमारी परीक्षा प्रणाली और नकल की समस्या
प्रत्येक व्यक्ति परीक्षा देना और सफल होने की इच्छा रखता है। नकल करने की प्रवृत्ति भी मानव सवभाव का अंग है। एक बच्चा भी बातें और सामान्य व्यवहार परायअपने बड़ो या प्रकृति की नकल करके ही सीखता है लेकिन एक विद्यार्थी का नकल करना उचित एवं हितकर नहीं कहा जा सकता। आज हमारी शिक्षा प्रणाली के फल स्वरुप नकल की प्रवृत्ति घातक सतर तक आम हो गई है जो निश्चित ही हमें पतन की ओर ले जाएगी।
भारत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली लॉर्ड मेकाले द्वारा चलाई
भारत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली लॉर्ड मेकाले द्वारा चलाई गई तथा आज यह प्रणाली एक विद्यार्थी की वास्तविक योग्यता का मानदंड प्रस्तुत कर पाने में बिल्कुल असमर्थ है। गाइड्स घटिया कुंजियां अधिक का दो-चार दिन सहारा लेकर परीक्षा देने वाले विद्यार्थी उत्तीर्ण हो जाते हैं ।जबकि वर्ष भर परिश्रम और लगन से पढ़ने वाले कई बार फेल या पिछड़ जाया करते हैं। परीक्षकगण उतर पुस्तिकाओं का परीक्षण तक ठीक ढंग से न कर बेगार में घास काटने जैसा काम करते हैं। जबकि प्रश्न पत्र बनाने वाले भी योग्यता और प्रतिभा को जांच सकने वाले ने प्रश्न न पूछ बार-बार वही घिस-पिट चुके प्रश्न ही पूछा करते हैं। आजकल तो धन के बल पर अंक तो बढ़वा ही लिए जाते हैं। प्रश्न पत्र भी परीक्षा से पहले ही निकलवा लिए जाते हैं, समाचार पत्रों में ऐसे समाचार आम पढ़ने को मिलते हैं।
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परीक्षाओं की तैयारी नकल के सहारे पास कर लेने की प्रवृत्ति
परीक्षाओं की तैयारी नकल के सहारे पास कर लेने की प्रवृत्ति दिन -प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। केवल स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र ही नहीं बल्कि कई तरह की प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने वाले भी नकल करने की आदत के शिकार हो गए हैं। वास्तव में ऐसे लोग सारा साल पढ़ाई लिखाई की ओर ध्यान नहीं देते। जब परीक्षा का समय आता है तो हर प्रकार के हथकंडे अपनाए जाने का प्रयास करते हैं। धन के बल पर प्रश्न पत्र लीक करवाने की प्रवृत्ति भी वास्तव में नकल की प्रवृत्ति ही है ।पुस्तकों के पन्ने फाड़ और छिपाकर परीक्षा भवन में ले जाए जाते हैं। गुसलखाना ,पेशाबघरों आदि में छिपाकर पुस्तके रख लेते हैंष फिर बार-बार पेशाब करने का बहाना बनाकर परीक्षा भवन से बाहर जाकर उन्हें देखने की कोशिश की जाती है। पकड़े जाने पर झूठ या फिर चिरौटी, कई बार धमकियों का सहारा भी लिया जाता है। सामूहिक नकल का बंदोबस्त भी भ्रष्ट शिक्षकों के सहारे लिया जाता है ।परीक्षा भवन में पानी पिलाने वाले भी बाहर से प्रश्नों का उत्तर लाते हैं। ट्यूशन करने वाले अध्यापक तथा शिक्षक भी खुली नकल करने दिया करते हैं। इस प्रकार वर्तमान परीक्षा प्रणाली वास्तव में नकल की प्रवृत्ति पर ही आधारित बनकर रह गई है।
नकल प्रधान परीक्षा प्रणाली के कई प्रकार के दुष्परिणाम
ऐसी नकल प्रधान परीक्षा प्रणाली के कई प्रकार के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। नकल को बढ़ावा मिलने के कारण आज की परीक्षा प्रणाली वास्तविक योग्यता का मानदंड नहीं रह गई है। नकल को रोकने का प्रयास करने वाले को तरह-तरह की धमकियां की छाया में तो जीना ही पड़ता है और कई बार प्राण भी गंवाने पड़ते हैं।
समय की मांग है कि परीक्षा प्रणाली में बदलाब
आज समय की मांग है कि परीक्षा प्रणाली के इस सड़े गले ढांचे को पूरी तरह बदला जाए। नकल मारने वालों को सब प्रकार से अयोग्य घोषित किया जाए। तभी सारे शिक्षा जगत और देश जाति का भी कल्याण संभव है।
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शिक्षा का उद्देश्य
शिक्षा का उद्देश्य किसी व्यक्ति की योग्यता की जांच परख करना होता है परंतु आधुनिक शिक्षा प्रणाली जो कि गुलाम भारत पर शासन करने वाले ब्रिटिश राज की देन है और वह इस सीमा तक घिस चुकी है और छिदरपूर्ण हो गई है कि इससे योग्य छात्र-छात्राओं की योग्यता की जांच पर सही प्रकार से नहीं हो पाती। परीक्षा से एक-दो दिन पहले ही प्रश्न पत्र लीक हो जाते हैं और इस सारे व्यापार में कहीं ना कहीं पढ़ाने वाले या परीक्षा तंत्र सनलिप्त रहता है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी को बढ़ावा
वर्तमान शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी को बढ़ावा देती है ।आज का छात्र जिंदगी के 15- 16 साल गँवा कार हाथों में डिग्री डिप्लोमा लेकर जब विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय से बाहर आता है तो वह अपने आप को असहाय एवं नितांत अकेला महसूस करता है क्योंकि डिग्री हासिल करने के बाद भी उसे कोई योग्यता नहीं मिलती। इस कारण वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली ही है।
शिक्षा इतनी महंगी है
आज शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि आम व्यक्ति की पहुंच से बाहर है ।उच्च शिक्षा प्राप्त करना कालेजों में दाखिला फीस 20- 30 हजार के बीच में ली जाती है।बाकी सारे साल का खर्चा अलग तथा पुस्तकों पर होने वाला खर्च अलग। इतना पैसा खर्च करने के बाद भी यदि नौकरी नहीं मिलती तो इतना पैसा खर्च करने का औचित्य ही क्या?
वर्तमान शिक्षा प्रणाली के मूल ढांचे में बदलाव
आज सबसे पहली आवश्यकता है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली के मूल ढांचे को बदलकर उसे समय अनुकूल तथा व्यवस्था एवं मुख बनाया जाना चाहिए। इस वर्तमान शिक्षा प्रणाली को न बदला गया तो इस देश का भगवान ही मालिक है।
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