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(Youth and Unemployment)Hindi Language

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  Youth and Unemployment(युवा वर्ग और बेकारी)

       भूखी स्त्री अपने पुत्र को छोड़ देती है। भूखी नागिन अपने अंडों को खा जाती है ।भूखा व्यक्ति क्या-क्या पाप नहीं करता। दयाहीन मनुष्य निर्धन ही तो होता है ।यही दशा आज के वर्तमान युग में विद्यमान है। चारों ओर चोरियां और लूटमार ,कई बैंक के खजाने को लूटने की घटनाएं, कहीं गाड़ियों को लूटने के समाचार, टेलीविजन में देखने और समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलते हैं ।आज युवा वर्ग की सबसे बड़ी चिंता अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना है। यह वह चाहे सदाचार से जुटाए या अनाचार से। आजकल अनपढ़ तो किसी ना किसी प्रकार से अपनी आजीविका कमा लेते हैं परंतु पढ़े-लिखे अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ है।

बेकारी की समस्या स्वतंत्र भारत को अंग्रेजों से विरसा विरासत के रूप में

         बेकारी की समस्या स्वतंत्र भारत को अंग्रेजों से विरसा विरासत के रूप में मिली थी। अंग्रेजी शासन ने इंग्लैंड के लाभ को देख ध्यान में रखते हुए यहां कल कारखानों की स्थापना में कोई रुचि नहीं ली और बाबूगिरी सिखाने वाली शिक्षा पद्धति चलाई थी। फलस्वरुप उस समय भी बेकारी का प्रश्न विद्यमान था। विभाजन लाखों लोगों जड़ी हुई दशा में यहां पहुंचा दिए तथा उन्हें भी फिर से स्थापित करना पड़ा। सरकार ने अनेकों प्रयतन किए किंतु 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।'

इस समस्या के दो रूप

          इस समस्या के दो रूप हैं, एक अशिक्षित व्यक्तियों की बेकारी और दूसरे शिक्षित व्यक्तियों की बेकारी ।वस्तुता इस समस्या के अनेक कारण हैं जैसे जनसंख्या की अधिकता ,बड़े-बड़े उद्योगों का विकास, कुटीर उद्योगों का विकास न होना तथा युवकों का दस्तकार्यों में रुचि ले लेना आदि। बेकारी के प्रमुख निम्नलिखित कारण है।

     उचित शिक्षा का अभाव

             देश में युवा वर्ग की अधिकारी का मुख्य कार्य उचित शिक्षा का अभाव है। कितने दुख की बात है कि विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पर अपने मां-बाप का इतना पैसा खर्च करवाते हैं परंतु फिर भी उनकी शिक्षा के अनुरूप उनको कोई नौकरी नहीं मिलती। इस वर्तमान शिक्षा प्रणाली का सारा दोष लॉर्ड मेकाले को जाता है। जिसने इस देश में नौकर और गुलाम पैदा करने के लिए ही मानवीय व्यवस्था कायम की थी। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में व्यवसायिक और औद्योगिक शिक्षा का बिल्कुल भी अभाव है ।हर साल पढ़े-लिखे लाखों लोग नौकरी के लिए तैयार हो जाते हैं ।जबकि हमारे देश में खाली पड़ी नौकरियां सैकड़ों व्यक्तियों के लिए भी नहीं होती हैं।

    हमारे स्कूलों और कॉलेजों में प्राय: शिक्षा का पुराना ढांचा

            हमारे स्कूलों और कॉलेजों में प्राय: शिक्षा का पुराना ढांचा ही चल रहा है। अधिकतर युवक बाबूगिरी करने के योग्य ही होते हैं। सरकार की ओर से टेक्निकल शिक्षा की संस्थाएं भी खोली गई है किंतु अभी हमारी युवकों का विशेष ध्यान उस और नहीं है। टेक्निकल शिक्षा प्राप्त करने वाले अधिकांश छात्र गांवों से संबंध रखते हैं। शहरी युवक हाथ और कपड़े काले करने वाले कामों की ओर जाने से झिझकते हैं। वह तो अफसरी के सपने लेते हैं और अब इस और भी सरकार ने ध्यान दिया है कि कालेजों आदि में ऐसे कोर्स भी होने चाहिए। जो किसी काम धंधे की और व्यक्ति को ले जा सके।

    विकारी के अन्य कारण

             विकारी का एक अन्य कारण यह भी है कि कुछ संस्थाएं काम पर लगे हुए लोगों को ही कुछ थोड़े पैसे और देकर उनसे ओवरटाइम लगवा लेती हैं इससे कारोबार में लगे व्यक्तियों की आय में तो कुछ वृद्धि हो जाती है परंतु बेकार लोगों को काम नहीं मिल पाता प्राइवेट कारखानों या संस्थाओं वाले इस प्रकार ओवरटाइम देकर स्वयं अधिक लाभ उठा जाते हैं

    बेकारी अन्य अनेक समस्याओं की जननी है 

              बेकारी अन्य अनेक समस्याओं की जननी है। बेकार व्यक्ति भी जीना तो चाहता है, काम न मिलने की दशा में वह अपराधों की ओर झुकता है, जेबकतरा, चोरिया, अवैध शराब विक्रेता आदि बनकर समाज के लिए सिरदर्द बन जाता है यदि उसके संस्कार उसे उस और न जाने दे तो वह नशीले पदार्थों का सेवन करें लगता है। आत्महत्या कर लेता है या किसी अनुसूचित राजनीतिक दल के हाथों बिक कर असंतोष फैलाता है ।

               जब तक जनसंख्या की वृद्धि को रोका नहीं जाता और जब तक हर काम को समान नहीं समझा जाता। तब तक इस समस्या का पूर्ण हल नहीं हो सकता।

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         उद्योग धंधों को भुलाना

           पहले लोग सारा काम अपने हाथों से करते थे कहीं सूत काता जाता था ,कहीं कपड़े बुने जाते थे, जिससे लोग घरेलू उद्योग धंधों द्वारा अपनी आजीविका कमाते थे परंतु मशीनों का युग आते ही बड़े-बड़े कारखाने लगाए गए। जिससे 100 व्यक्तियों का काम एक ही मशीन कर देती है ।इससे बेकारी को बढ़ावा मिला तथा छोटे उद्योग बंद होने शुरू हो गए।

    बड़े-बड़े उद्योग धंधों

            बड़े-बड़े उद्योग धंधों ने कुछ लोगों को रोजगार दिया है किंतु दूसरी और बहुत से लोगों को बेकार बना दिया है। जो लोग स्वतंत्र रूप से काम करते थे ।मशीन ने उनसे वह काम छीन लिया है। मशीन पर नियुक्त एक व्यक्ति हाथ से काम करने वाले 10 व्यक्तियों की जगह ले लेता है। फलस्वरुप 9 व्यक्ति बेकार हो जाते हैं।इसका अर्थ यह नहीं कि कारखाने न लगाई जाए किंतु संतुलन होना चाहिए। साथ ही कुटीर उद्योगों का भी विकास होना चाहिए। 

    जापान उन्नति का कारण

             जापान उन्नति का कारण वहां फैले हुए लघु उद्योग हैं हमारे देश में लोगों लोगों की और इतना ध्यान नहीं दिया गया। आवश्यकता इस बात की है कि लघु उद्योगों का पूर्ण विकास करके मानव शक्ति का सदुपयोग किया जाए।

              कल कारखानों ने विकास ने और नगरों के विकास में अशिक्षित व्यक्तियों में विकारी बढ़ाई है। वे अपने गवों आदि से उजड़ कर शहरों में काम ढूंढने पहुंचे हैं। जहां पहले ही काम नहीं है। 

     झूठा स्वाभिमान

            आज के युवा वर्ग में मिथ्या स्वाभिमान पाया जाता है। वह भूखा मरना तो पसंद करता है परंतु कोई छोटा सा कारोबार करके अपना जीवन बिताना पसंद नहीं करता। वह केवल दफ्तर का बाबू बन्ना अधिक पसंद करता है।

     विभिन्न परीक्षणों की बहुलता  प्रशिक्षणों

             आज के युग में जब शिक्षा के द्वार सभी के लिए खुले हुए हैं। बिना उचित योग्यता के आज युवा वर्ग वैज्ञानिक इंजीनियर अध्यापक या कंप्यूटर का शिक्षक बनने के लिए प्रयत्नशील है। इतना ही नहीं वह ऊंचे से ऊंचा परीक्षण प्राप्त करके तकनीकी विशेषज्ञ की नौकरी तलाश करता है क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण वह कोई फैक्ट्री नहीं चला सकता।

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     बढ़ती हुई जनसंख्या

     हमारे देश में जनसंख्या में दिन-प्रतिदिन अत्यधिक वृद्धि हो रही है वर्ष भर में जितने व्यक्तियों को काम पर लगाया जाता है उससे कई गुना अधिक अधिकारी की संख्या को बढ़ा देते हैं सन 1947 में भारत की 36 करोड़ जनसंख्या 1981 में 68 करोड़ तक पहुंच गई और 23 मई 2000 तक भारत की जनसंख्या 1 अरब हो गई और सन् 2021 से 1अरब 50 करोड़ पार कर गई ।जैसे घर में खाने वाले अधिक हो और कमाने वाला एक ही हो। तो उस घर का हाल कैसा होगा यही हाल आज भारत का है।

    पश्चिम के अर्थशास्त्री माल्थस

             पश्चिम के अर्थशास्त्री माल्थस ने बहुत पहले कहा था कि वस्तु की वृद्धि 1,2,3,4 के कर्म से होती है और जनसंख्या में वृद्धि 2,4,8, 16 के क्रम से। इस प्रकार दोनों का अनुपात ठीक नहीं रहता ।भारत में स्वतंत्रता के बाद जनसंख्या में बहुत वृद्धि हुई है। हर पंचवार्षिक योजना में जितने व्यक्तियों को काम देने की व्यवस्था की गई। जनसंख्या उसे कहीं अधिक बढ़ गई और फलस्वरुप बेकारी भी बढ़ गई। कीटाणु नाशक औषधियों के कारण मलेरिया आदि पर भी विजय पा ली है और अन्य औषधियों के आविष्कारों ने भी मृत्यु दर को घटाया है। जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए परिवार नियोजन के कार्यक्रम चल रहे हैं किंतु अभी तक जनसंख्या में होने वाली वृद्धि पर उचित उचित नियंत्रण नहीं हो पाया है। अतः अधिकारी का एक कारण यह भी है।

     धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था

     हमारी सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था अधिकारी बढ़ाने में अपना पूरा योगदान प्रदान करती है। साधु सन्यासियों को दान देना पुण्य का कार्य समझा जाता है। जिससे कई रिस्ट पुस्ट व्यक्तियों ने इसे अपना व्यवसाय बना लिया है। इसे बेकारी में निरंतर वृद्धि होती रहती है। हमारा सामाजिक ढांचा ही कुछ ऐसा बन गया है। कि व्यवस्था के अनुसार विशेष वर्ग के लोगों के लिए विशेष कार्य हैं। जिन्हें करना विशेष वर्ग का व्यक्ति अपना परम कर्तव्य समझता है। यदि उसे अपने वर्ग के समान कार्य मिल जाता है। तो वह कार्य करेगा नहीं तो वह बेकार बैठा रहेगा ।यह सामाजिक व्यवस्था भी बेकारी को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रही है।

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     बेकारी से हानि

         बेरोजगारी के कारण नवयुवकों में असंतोष की भावना पाई जाती है। जिससे समाज में अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई है यदि इस समस्या का हल शीघ्र ना निकाला गया। तो वह सिथति विकराल रूप धारण कर सकती है। जिस पर काबू पाना मुश्किल हो जाएगा।

     इस समस्या से निपटने के लिए हमें निम्नलिखित उपाय करने चाहिए:

     शिक्षा प्रणाली में सुधार

           सबसे पहले हमें अपने शिक्षा प्रणाली में सुधार करने होंगे ।शिक्षा केवल किताबी ना होकर व्यवहारिक होनी चाहिए। ऐसे पृष्ठ शिक्षण केंद्र खोले जाएं जहां विद्यार्थी 12वीं की पढ़ाई पूरी करके साथ में पढ़ भी सके और साथ ही व्यवसाय का प्रशिक्षण भी प्राप्त कर सके। ताकि बाद में उनको व्यवसाय के लिए परेशानी ना उठानी पड़े।

       आलस्य को दूर करना

     आज भारत देश में लोग आलसी होते जा रहे हैं ।प्रत्येक व्यक्ति मेहनत द्वारा रोटी कमा कर खाने की बजाय पकी पकाई रोटी खाना चाहता है। सभी सरल कार्य करके रातो रात अमीर बनने के सपने देखते हैं ।इसलिए हमें अपने इस आलस्य को दूर करना होगा और कोई ना कोई काम धंधा अपना कर अपना गुजारा करना होगा।

     उद्योग धंधों का विकास

     छोटे-छोटे उद्योग धंधे जैसे सूत कातना, कपड़े बुनना शहद तैैयार करना इत्यादि का विकास किया जाना चाहिए ।ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल सके।

    https://hindilanguage09.blogspot.com/2023/01/youth-and-unemployment.html

     जनसंख्या वृद्धि पर रोक

     बेकारी की समस्या को कम करने के लिए देश में बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगानी होगी। हमें आतम संयम से रहना होगा परिवार नियोजन की योजनाओं की और अधिक कारगर ढंग से लागू करना चाहिए। विवाह की आयु का नियम सारे देश में एक समान होना चाहिए। अभी भी ऐसे कुछ गांव है। जहां पर लड़कियों की शादी छोटी उम्र में कर दी जाती है।

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     ग्राम विकास तथा कृषि सुधार

     भारत एक कृषि प्रधान देश है। बेकारी की समस्या जितनी शहरों में है। उतनी ही गामों में भी है। गांवों में छोटे छोटे उद्योगों का विकास होना चाहिए। ताकि गांव के लोगों को नौकरी के लिए शहर ना आना पड़े।

     भारत सरकार बेकारी की समस्या को हल करने के लिए जागरूक है ।इस दिशा में उसने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, परिवार नियोजन, कच्चा माल एक दूसरे स्थान पर ले जाने की सुविधा, कृषि भूमि की हदबंदी, नए नए उद्योगों की स्थापना, प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना, प्रधानमंत्री रोजगार योजना आदि अनेक कार्य ऐसे है। जो बेरोजगारी दूर करने में एक सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं। यदि सुनिश्चित कदम उठाए जाए तो इस समस्या का समाधान किया जा सकता है और युवा वर्ग को सही अर्थों में समाज का राष्ट्र के कार्यों में लगाया जा सकता है।

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